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बीजेपी की चुनावी जीत के समंदर में गोते खाती भारतीय अर्थव्यवस्था

इस संपादकीय के जरिए हम नजर डाल रहे हैं भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े कुछ बेहद प्रासंगिक सवालों पर जो भारतीय अर्थव्यस्था से मुखौटे हटाने का काम कर रहे हैं
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BJP is winning elections after elections but the govt is losing on economy, writes Surjit BhallaPSUWatch.com
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जाने-माने अर्थशास्त्री और आमतौर पर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और पीएम मोदी के समर्थक माने जाने वाले सुरजीत भल्ला ने इंडियन एक्सप्रेस के लिए एक लेख लिखा है. लेख अंग्रेजी में है और लेख के शीर्षक का मोटा अनुवाद है कि बीजेपी लगातार जीत तो रही है लेकिन देश आर्थिक मोर्चे पर हार रहा है. भल्ला कहते हैं कि ठीक एक समय दो घटनाएं घट रही हैं, बीजेपी अपनी राजनीतिक उपलब्धि और ख्याति के चरम पर है और देश की अर्थव्यवस्था ठीक उसी समय रसातल में है. इन दोनों घटनाओं का आपस में कोई संबंध हो भी सकता है और नहीं भी. लेकिन 12 साल से देश के ज्यादातर हिस्से और केंद्र में चूंकि बीजेपी का ही शासन है, इसलिए इस घटना के कॉज़ एंड इफेक्ट प्रकृति से इंकार भी नहीं किया जा सकता. अब सुरजीत भल्ला कोई रोजमर्रा के राजनीतिक टिप्पणीकार नहीं हैं। वे भारत के जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे हैं और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष (IMF) में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। लंबे समय तक उन्हें आर्थिक उदारीकरण तथा निवेश समर्थक सोच का समर्थक माना जाता रहा है। उन्होंने अक्सर भाजपा सरकार के फैसलों का बचाव किया है और मोदी के नेतृत्व की प्रशंसा की है लिहाजा भल्ला की टिप्पणी को गंभीरता से लेने की जरूरत है.

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भारत नहीं है तेजी से बढ़ती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्था

सुरजीत भल्ला लिखते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी है, और अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने के लिए चार कारक ज़िम्मेदार हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारक खुद सरकार है। वह समस्या को पहचानती है, लेकिन संकट के लिए दूसरों को दोष देकर छुट्टी पाने में मस्त है. दूसरा कारक है- बड़े उद्योग. तीसरा कारक कांग्रेस पार्टी है, जो गांधी परिवार के नेतृत्व में इतनी सहज हो चुकी है कि BJP का एक-दलीय लोकतांत्रिक शासन लगभग तय हो चुका है. चौथा कारक वह सूत्रधार है जो इन तीनों को नियंत्रित करता है: 'डीप स्टेट' (Deep State). यह संकट इसलिए बना हुआ है क्योंकि अर्थव्यवस्था उसी गति से आगे बढ़ रही है जिसे दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ गति होने का दावा करते हुए गर्व से प्रचारित किया जाता है.

भल्ला लिखते हैं कि ये दावा सरासर झूठ है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था है. इस बात के पक्ष में वो तर्क देते हुए भल्ला लिखते हैं - 2014 से शुरू हुए BJP शासनकाल के दौरान, GDP वृद्धि के मामले में भारत का स्थान नौवाँ है; प्रति व्यक्ति GDP वृद्धि के मामले में यह आठवें स्थान पर है; और अमेरिकी डॉलर के संदर्भ में प्रति व्यक्ति वृद्धि के मामले में यह 16वें स्थान पर है.

अमेरिकी डॉलर के संदर्भ में वृद्धि के मामले में बांग्लादेश पहले स्थान पर है, जहाँ प्रति व्यक्ति औसत वृद्धि दर 8.3 प्रतिशत प्रति वर्ष है. इथियोपिया 7.2 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि भारत महज़ 4.7 प्रतिशत के साथ 16वें स्थान पर है. आँकड़ों का विश्लेषण किसी भी तरह से क्यों न किया जाए, अब समय आ गया है कि "सबसे तेज़ी से बढ़ती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्था" का तमगा हटा दिया जाए. भारत 2013 में "कमज़ोर पाँच" (Fragile Five) अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने से आगे बढ़कर, अब शायद Fragile two यानी सिर्फ दो (तुर्की के साथ) में से एक बनने की राह पर है. पिछले एक साल में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 12 प्रतिशत कमज़ोर हुआ है - यह गिरावट का लगातार सातवाँ साल है - और 2025 में भारतीय रूपए को एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में गिना गया.

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भल्ला लिखते हैं कि ये दावा सरासर झूठ है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्था है
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West Asia crisis a balance of payments stress test, India better placed to navigate: Nageswaran

भारतीय अर्थव्यवस्था पर विदेशी निवेशकों का बढ़ता अविश्वास

भल्ला आगे लिखते हैं कि आज भारत एक मैक्रोइकोनॉमिक विरोधाभास पेश करता है: महँगाई काबू में है, चालू खाता घाटा (CAD) संभालने लायक है, विकास दर स्थिर बनी हुई है, और राजनीतिक स्थिरता असाधारण रूप से मज़बूत है। सैद्धांतिक रूप से, ये स्थितियाँ मुद्रा में विश्वास को बढ़ावा देनी चाहिए, न कि अत्यधिक कमज़ोरी को। लेकिन ठीक इसी समय विदेशी निवेशक अप्रत्याशित रूप से भारत से अपना निवेश बाहर लेकर जा रहे हैं. ऐसा क्यों है. कारण साफ है कि भारतीय नीतिनिर्माताओं पर निवेशकों का भरोसा नहीं है. फिर चाहे मामला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का हो या फिर घरेलू निवेशकों के असमंजस का.

GDP वृद्धि, निर्यात प्रदर्शन और विनिर्माण प्रतिस्पर्धा का एक प्रमुख चालक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) है। FDI अपने साथ विदेशी तकनीक, पूँजी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ जुड़ाव लाता है। FDI जितना अधिक होगा, निवेश उतना ही अधिक होगा और विकास दर भी उतनी ही अधिक होगी। यह दुनिया भर में एक सर्वमान्य सिद्धांत है, और 2015 तक भारत में भी इसे ही स्वीकार किया जाता था।

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Reforms will continue; industry needs to spend more on R&D, shed protectionist instinct: NITI Member

2015 के बाद की नई मानसिकता यह मानती है कि भारत विदेशी निवेशकों पर अपनी शर्तें थोप सकता है क्योंकि निवेशक "विशाल" भारतीय बाज़ार में प्रवेश करने के लिए "मरे जा रहे हैं"। भल्ला लिखते हैं कि इस विशाल बाज़ार के आकार को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए ये आंकड़ा देखिए कि साल 2025 में भारत की GDP, अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया राज्य की GDP से भी कम थी। बहरहाल, इसी मानसिकता के चलते 2015 में द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) के ढाँचे में आमूल-चूल बदलाव किए गए। इसके तुरंत बाद, गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (QCOs) की संख्या में भारी उछाल आया - जो 2017 में केवल 14 थी, वह दिसंबर 2024 तक बढ़कर 765 हो गई; ये आदेश घरेलू उद्योगों के लिए - विशेष रूप से उन कंपनियों के लिए जिनके विदेशी साझेदार हैं - सुरक्षा का एक अतिरिक्त साधन मात्र बनकर रह गए।

2015 के संशोधित BIT में यह शर्त रखी गई थी कि कोई विदेशी निवेशक, अपने भारतीय उद्यम से बाहर निकलने से पहले, मध्यस्थता (arbitration) की प्रक्रिया शुरू करने से पहले पाँच साल तक इंतज़ार करे, और यह मध्यस्थता किसी भारतीय न्यायाधीश के सामने हो। आप सोचिए, जिस देश में खुद भारतीय नागरिक, विषय या शिकायत चाहे जो भी हो, भारतीय अदालतों में जाने से हिचकिचाते हैं, तो फिर आप किसी विदेशी निवेशक से क्या ऐसा करने की उम्मीद रख सकते हैं?

भल्ला का कहना है कि विदेशी निवेश को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाने वाला प्रावधान यह था कि विदेशी निवेशकों को अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता का सहारा लेने से पहले, पाँच साल तक भारत के स्थानीय कानूनी उपायों को आज़माना ज़रूरी था। इतिहास में ऐसा कोई विवाह हुआ है क्या—चाहे वह किसी भी तरह का हो—जिसमें पाँच साल के 'कूलिंग-ऑफ पीरियड' की ज़रूरत पड़ती हो? यहाँ तक कि अब भी, सरकार द्वारा वादा किया गया सुधार केवल उस व्यवस्था को थोड़ा नरम बनाने के उद्देश्य से ही लगता है, न कि उस पर पूरी तरह से पुनर्विचार करने के उद्देश्य से। बहरहाल, इस साल द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) की समीक्षा की जा रही है और संभव है कुछ सुधार किये जाएं.

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India needs to build domestic risk capital; cut reliance on foreign fund: Uday Kotak

राजनीतिक सफलता का उत्कर्ष और अतिआत्मविश्वास

भल्ला अपने लेख के आखिरी पैराग्राफ में बेहद गंभीर सवाल उठाते हैं. उन्होंने लिखा है कि बीजेपी की अत्यधिक राजनीतिक सफलता का एक गहरा खतरा यह है कि यह इस सोच को बढ़ावा दे सकता है कि उसकी नीतियाँ पहले से ही काफी अच्छी हैं. सच ये है कि ऐसा नहीं है। भारत के पास अभी भी स्थिरता, विशालता और वैश्विक प्रासंगिकता के फायदे मौजूद हैं और मौजूदा पश्चिम एशियाई संकट आर्थिक सुधारों के लिए एक "परफेक्ट स्टॉर्म" (अनुकूल परिस्थितियों का मेल) साबित हो सकता है. जब तक सरकार इस मौके का इस्तेमाल निवेश के माहौल को बेहतर बनाने, संधियों की विश्वसनीयता बहाल करने और सुधारों के प्रति अपनी गंभीरता का संकेत देने के लिए नहीं करती, तब तक राजनीतिक वर्चस्व ताकत जैसा कम और ताकत के विकल्प जैसा ज़्यादा लगने लगेगा. भल्ला लिखते हैं कि चुनाव सत्ता दिला सकते हैं लेकिन देश में समृद्धि केवल नीतियाँ ही ला सकती हैं.

पूरी दुनिया की नजर हम पर बनी हुई है.

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